जीवन में सूझ-बूझ

जीवन में सूझ-बूझ

एक किसान थककर खेतो में लौट रह था | उसे भूख भी बहुत लगी थी लेकिन जेब में चंद सिक्के ही थे | रास्ते में हलवाई की दुकान पड़ती थी | किसान हलवाई ककी दुकान पर रुका तो उसकी मिठाइयो की सुगंध का आनंद लेने लगा |

हलवाई ने उसे एसा करते देखा तो उसकी कुटिलता सूझी | जैसे ही किसान लौटने लगा, हलवाई ने उसे रोक लिया |

किसान हैरान होकर देखने लगा | हलवाई बोला- पैसे निकालो | किसान ने पूछा पैसे किस बात के? मेने तो मिठाई खाई ही नहीं |

जवाब में हलवाई बोला- तुमने मिठाई खाई बेशक नहीं हैं लेकिन यहाँ यहाँ इतनी देर खड़े होकर आनंद तो लिया हैं न |

मिठाई कि खुबसू लेना मिठाई खाने के बराबर हैं | तो तुम्हे उस खुसबू का आनंद उठाने के ही पैसे भरने होगे |

किसान पहले तो घबरा गया लेकिन थोड़ी सूझ-बूझ बरतते हुए उसने अपनी जेब से सिक्के निकले |

उन सिक्को को दोनों हाथो के बिच डालकर खनकाया | जब हलवाई ने सिक्को कि खनक सुन ली तो किसान जाने लगा |

हलवाई ने फिर पैएसे मांगे तो उसने कहा- जिस तरह मिठाई कि खुशबु लेना मिताही खाने के बराबर हैं, उसी तरह सिक्को कि खनक सुनना पैसे लेने के बराबर हैं |

मंत्र : सूझबूझ से मुश्किल हल करे |

बात जो दिल को छू गयी

बात जो दिल को छू गयी

किसी गाँव में एक ताले वाले की दुकान थी। ताले वाला रोजाना अनेकों चाबियाँ बनाया करता था। ताले वाले की दुकान में एक हथौड़ा भी था| वो हथौड़ा रोज देखा करता कि ये चाभी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है।

एक दिन हथौड़े ने चाभी से पूछा कि मैं तुमसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ, मेरे अंदर लोहा भी तुमसे ज्यादा है और आकार में भी तुमसे बड़ा हूँ लेकिन फिर भी मुझे ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और तुम इतनी छोटी हो फिर भी इतनी आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती हो।

चाभी ने मुस्कुरा के ताले से कहा कि तुम ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन मैं ताले के अंदर तक जाती हूँ, उसके अंतर्मन को छूती हूँ और घूमकर ताले से निवेदन करती हूँ और ताला खुल जाया करता है।

वाह! कितनी गूढ़ बात कही है चाभी ने कि मैं ताले के अंतर्मन को छूती हूँ और वो खुल जाया करता है। दोस्तों आप कितने भी शक्तिशाली हो या कितनी भी आपके पास ताकत हो, लेकिन जब तक आप लोगों के दिल में नहीं उतरेंगे, उनके अंतर्मन को नहीं छुयेंगे तब तक कोई आपकी इज्जत नहीं करेगा।

हथौड़े के प्रहार से ताला खुलता नहीं बल्कि टूट जाता है ठीक वैसे ही अगरआप शक्ति के बल पर कुछ काम करना चाहते हैं तो आप 100% नाकामयाब रहेंगे क्योंकि शक्ति ने आप किसी के दिल को नहीं छू सकते।

अब्दुल कलाम आजाद, कोई पहलवान नहीं थे लेकिन उनकी बातों ने और उनके आविष्कारों ने लोगों के दिल को छुआ, कलाम जी के जीवन ने लोगों के अंतर्मन में जगह बनाई इसलिए आज जीवित ना होकर भी वो हम लोगों के दिल में जिन्दा हैं।

दोस्तों चाभी बन जाओ, सबके दिल की चाभी

यही इस कहानी की सीख है

सफलता का गुरु मंत्र ~~ उड़ना है तो गिरना सीख लो

सफलता का गुरु मंत्र ~~ उड़ना है तो गिरना सीख लो

एक चिड़िया का बच्चा जब अपने घोंसले से पहली बार बाहर निकलता है तो उसके पंखों में जान नहीं होती। वो उड़ने की कोशिश करता है लेकिन जरा सा उड़कर गिर जाता है। वह फिर से दम भरता है और फिर से उड़ने की कोशिश करता है लेकिन फिर गिरता है।

वो उड़ता है और गिरता है। यही क्रम निरंतर चलता जाता है। एक बार नहीं, दो बार नहीं बल्कि हजारों बार वो गिरता है लेकिन वो उड़ना नहीं छोड़ता और एक समय ऐसा भी आता है जब वो खुले आकाश में आनंद से उड़ता है।

मेरे दोस्त जिंदगी में अगर उड़ना है तो गिरना सीख लो क्योंकि आप गिरोगे, एक बार नहीं बल्कि कई बार। आपको गिरकर फिर उठना है और फिर उड़ना है।

याद करो वो बचपन के दिन, जब बच्चा छोटा होता है तो वो चलने की कोशिश करता है। पहली बार चलता है तो गिरता है, आप भी गिरे होंगे। एक बार नहीं, कई बार, और कई बार तो बच्चों को चोट भी लग जाती है। किसी का दांत टूट जाता है, तो किसी के घुटने में चोट लग जाती है और कई बार तो सर से खून तक निकल आता है, पट्टी बांधनी पड़ती है।

लेकिन वो बच्चा चलना नहीं छोड़ता। सर पे पट्टी बंधी है, चोट लगी है, दर्द भी हुआ है लेकिन माँ की नजर बचते ही वो फिर से चलने की कोशिश करता है। उसे गिरने का डर नहीं है और ना ही किसी चोट का डर है, उसको चलना सीखना है और वो तब तक नहीं मानता जब तक चल ना ले।

सोचो उस बच्चे में कितनी हिम्मत है, उसके मन में एक लक्ष्य है – “चलना सीखना”। और वो चलना सीख भी जाता है क्योंकि वो कभी गिरने से डरता ही नहीं है।

लेकिन जब यही बच्चा बड़ा हो जाता है, उसके अदंर समझ आ जाती है तो वो डरने लगता है। इंसान जब भी कोई नया काम करने की कोशिश करता है उसके मन में गिरने का डर होता है।

=> स्टूडेंट डरता है कि पहला इंटरव्यू है, नौकरी लगेगी या नहीं लगेगी….

=> बिजनेसमैन डरता है कि नया बिजनिस कर तो लिया लेकिन चलेगा या नहीं चलेगा….

=> क्रिकेटर सोचता है कि मेरा पहला मैच है रन बना पाउँगा या नहीं बना पाउँगा…

अरे नादान मानव, तुमसे ज्यादा साहसी तो वो बच्चा है जो हजार बार गिरकर भी गिरने से नहीं डरता। सर से खून भी आ जाये तो भी नन्हें कदम फिर से चलने की कोशिश करते हैं। और एक तुम तो हो, थोड़े समझदार क्या हुए, तुम तो नासमझ हो गए।

दुनिया में कोई भी इंसान इतनी आसानी से सफल नहीं होता, ठोकरें खानी पड़ती हैं। अब ठोकरों से डरोगे तो कभी सफल नहीं हो पाओगे। राह में चाहे जितनी ठोकरें आयें आप अपने लक्ष्य को मत छोड़ो। ये ठोकरें तो आपकी परीक्षा लेती हैं, आपके कदम को मजबूत बनाती हैं ताकि जिंदगी में फिर कभी ठोकर ना खानी पड़े।

हर काम अपने समय पर ही होता है

हर काम अपने समय पर ही होता है

एकबार एक व्यक्ति भगवान् के दर्शन करने पर्वतों पर गया| जब पर्वत के शिखर पर पहुंचा तो उसे भगवान् के दर्शन हुए| वह व्यक्ति बड़ा खुश हुआ|

उसने भगवान से कहा – भगवान् लाखों साल आपके लिए कितने के बराबर हैं ?

भगवान ने कहा – केवल 1 मिनट के बराबर

फिर व्यक्ति ने कहा – भगवान् लाखों रुपये आपके लिए कितने के बराबर हैं ?

भगवान ने कहा – केवल 1 रुपये के बराबर

तो व्यक्ति ने कहा – तो भगवान क्या मुझे 1 रुपया दे सकते हैं ?

भगवान् मुस्कुरा के बोले – 1 मिनट रुको वत्स….हा हा

मित्रों, समय से पहले और नसीब से ज्यादा ना कभी किसी को मिला है और ना ही मिलेगा| हर काम अपनेवक्त पर ही होता है| वक्त आने पर ही बीज से पौधा अंकुरित होता है, वक्त के साथ ही पेड़ बड़ा होता है, वक्त आने पर ही पेड़ पर फल लगेगा| तो दोस्तों जिंदगी में मेहनत करते रहो जब वक्त आएगा तो आपको फल जरूर मिलेगा|

हाथी और रस्सी

हाथी और रस्सी

एक व्यक्ति रास्ते से गुजर रहा था कि तभी उसने देखा कि एक हाथी एक छोटे से लकड़ी के खूंटे से बंधा खड़ा था| व्यक्ति को देखकर बड़ी हैरानी हुई कि इतना विशाल हाथी एक पतली रस्सी के सहारे उस लकड़ी के खूंटे से बंधा हुआ है|

ये देखकर व्यक्ति को आश्चर्य भी हुआ और हंसी भी आयी| उस व्यक्ति ने हाथी के मालिक से कहा – अरे ये हाथी तो इतना विशाल है फिर इस पतली सी रस्सी और खूंटे से क्यों बंधा है ? ये चाहे तो एक झटके में इस रस्सी को तोड़ सकता है लेकिन ये फिर भी क्यों बंधा है ?

हाथी के मालिक ने व्यक्ति से कहा कि श्रीमान जब यह हाथी छोटा था मैंने उसी समय इसे रस्सी से बांधा था| उस समय इसने खूंटा उखाड़ने और रस्सी तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन यह छोटा था इसलिए नाकाम रहा| इसने हजारों कोशिश कीं लेकिन जब इससे यह रस्सी नहीं टूटी तो हाथी को यह विश्वास हो गया कि यह रस्सी बहुत मजबूत है और यह उसे कभी नहीं तोड़ पायेगा इस तरह हाथी ने रस्सी तोड़ने की कोशिश ही खत्म कर दी|

आज यह हाथी इतना विशाल हो चुका है लेकिन इसके मन में आज भी यही विश्वास बना हुआ है कि यह रस्सी को नहीं तोड़ पायेगा इसलिए यह इसे तोड़ने की कभी कोशिश ही नहीं करता| इसलिए इतना विशाल होकर भी यह हाथी एक पतली सी रस्सी से बंधा है|

दोस्तों उस हाथी की तरह ही हम इंसानों में भी कई ऐसे विश्वास बन जाते हैं जिनसे हम कभी पार नहीं पा पाते| एकबार असफल होने के बाद हम ये मान लेते हैं कि अब हम सफल नहीं हो सकते और फिर हम कभी आगे बढ़ने की कोशिश ही नहीं करते और झूठे विश्वासों में बंधकर हाथी जैसी जिंदगी गुजार देते हैं|

इंसान की कीमत

इंसान की कीमत

एकबार एक टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे| बच्चों को कुछ नया सिखाने के लिए टीचर ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकाला| अब बच्चों की तरफ वह नोट दिखाकर कहा – क्या आप लोग बता सकते हैं कि यह कितने रुपये का नोट है ?

सभी बच्चों ने कहा – “100 रुपये का”

टीचर – इस नोट को कौन कौन लेना चाहेगा ? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया|

अब उस टीचर ने उस नोट को मुट्ठी में बंद करके बुरी तरह मसला जिससे वह नोट बुरी तरह कुचल सा गया| अब टीचर ने फिर से बच्चों को नोट दिखाकर कहा कि अब यह नोट कुचल सा गया है अब इसे कौन लेना चाहेगा ?

सभी बच्चों ने फिर हाथ उठा दिया।

अब उस टीचर ने उस नोट को जमीन पर फेंका और अपने जूते से बुरी तरह कुचला| फिर टीचर ने नोट उठाकर फिर से बच्चों को दिखाया और पूछा कि अब इसे कौन लेना चाहेगा ?

सभी बच्चों ने फिर से हाथ उठा दिया|

अब टीचर ने कहा कि बच्चों आज मैंने तुमको एक बहुत बड़ा पढ़ाया है| ये 100 रुपये का नोट था, जब मैंने इसे हाथ से कुचला तो ये नोट कुचल गया लेकिन इसकी कीमत 100 रुपये ही रही, इसके बाद जब मैंने इसे जूते से मसला तो ये नोट गन्दा हो गया लेकिन फिर भी इसकी कीमत 100 रुपये ही रही|

ठीक वैसे ही इंसान की जो कीमत है और इंसान की जो काबिलियत है वो हमेशा वही रहती है| आपके ऊपर चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएँ, चाहें जितनी मुसीबतों की धूल आपके ऊपर गिरे लेकिन आपको अपनी कीमत नहीं गंवानी है| आप कल भी बेहतर थे और आज भी बेहतर हैं|

ਕੁਦਰਤ ਦਾ ਕ੍ਰਿਸ਼ਮਾ 425 ਸਾਲ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਇਤਿਹਾਸਕ ਬੇਰੀਆਂ ਨੂੰ ਨਵੇਂ-ਨਰੋਏ ਰੁੱਖ ਵਾਂਗ ਫਲ ਲੱਗਾ

ਕੁਦਰਤ ਦਾ ਕ੍ਰਿਸ਼ਮਾ 425 ਸਾਲ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਇਤਿਹਾਸਕ ਬੇਰੀਆਂ ਨੂੰ ਨਵੇਂ-ਨਰੋਏ ਰੁੱਖ ਵਾਂਗ ਫਲ ਲੱਗਾ

ਦੇਖੋ, ਬੇਰਾਂ ਨਾਲ ਮੁੜ ਲੱਦੀ ਦੁੱਖ ਭੰਜਨੀ ਬੇਰੀ, ਸੰਗਤਾਂ ”ਚ ਭਾਰੀ ਉਤਸ਼ਾਹ .. ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਪਰਿਕਰਮਾ ‘ਚ ਲੱਗੀਆਂ ਤਿੰਨ ਬੇਰੀਆਂ ‘ਤੇ ਇਸ ਵਾਰ ਭਰਪੂਰ ਫਲ ਲੱਗਾ ਹੈ। ਸਵਾ ਚਾਰ ਸੌ ਸਾਲ ਪੁਰਾਣੀਆਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਇਤਿਹਾਸਕ ਬੇਰੀਆਂ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਨਵੇਂ-ਨਰੋਏ ਰੁੱਖ ਵਾਂਗ ਫਲ ਲੱਗਣਾ ਕੁਦਰਤ ਦਾ ਕ੍ਰਿਸ਼ਮਾ ਹੀ ਹੈ। ਸ੍ਰੀ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਪਰਿਕਰਮਾ ‘ਚ ਲੱਗੀ ਦੁੱਖ ਭੰਜਨ ਬੇਰੀ ਨੂੰ ਇਸ ਸਾਲ ਭਰਵਾਂ ਫਲ ਲੱਗਾ ਹੈ।

ਦੁੱਖਾਂ ਦਾ ਖੰਡਨ ਕਰਕੇ ਦੇਹ ਅਰੋਗਤਾ ਬਖਸ਼ਣ ਵਾਲੀ ਦੁੱਖ ਭੰਜਨੀ ਬੇਰੀ ਨੂੰ ਲੱਗੇ ਫਲ ਵੇਖ ਗੁਰਬਾਣੀ ਦੀ ਤੁਕ ‘ਸੂਕੇ ਹਰੇ ਕੀਏ ਖਿਨ ਮਾਹਿ..’ ਆਪ ਮੁਹਾਰੇ ਮੂੰਹੋਂ ਨਿਕਲਦੀ ਹੈ। ਬੀਬੀ ਰਜਨੀ ਦੇ ਪਤੀ ਦਾ ਕੋਹੜ ਮਿਟਾਉਣ ਵਾਲੀ ਦੁੱਖ ਭੰਜਨੀ ਬੇਰੀ ਸੁੱਕਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਇਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਹਰੀ ਹੋ ਗਈ ਹੈ। ਕੁਦਰਤ ਦੀ ਇਸ ਕਰਾਮਾਤ ਤੋਂ ਵਾਕਈ ਬਲਿਹਾਰੀ ਜਾਣ ਦਾ ਜੀਅ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ।

ਕੁਝ ਸਮਾਂ ਪਹਿਲਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਬੇਰੀਆਂ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਕਾਫੀ ਖਰਾਬ ਹੋ ਚੁੱਕੀ ਸੀ ਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਰੱਖਣ ਲਈ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਕਮੇਟੀ ਨੇ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਲੁਧਿਆਣਾ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਸੌਂਪੀ ਸੀ।

ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਲੁਧਿਆਣਾ ਨੇ ਵੀ ਇਸ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਨੂੰ ਬਾਖੂਬੀ ਨਿਭਾਇਆ ਅਤੇ ਅੱਜ ਨਾ ਸਿਰਫ ਇਹ ਬੇਰੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਹੋਈਆਂ, ਸਗੋਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੋਟਾ ਅਤੇ ਮਿੱਠਾ ਫਲ ਵੀ ਲੱਗ ਚੁੱਕਾ ਹੈ। ਇਸ ਇਤਿਹਾਸਕ ਬੇਰੀ ਨੂੰ ਫਲ ਲੱਗਣ ਨਾਲ ਸੰਗਤਾਂ ‘ਚ ਕਾਫੀ ਉਤਸ਼ਾਹ ਦੇਖਿਆ ਗਿਆ। ਬੇਰੀ ਦੇ ਫਲ ਨੂੰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਦੇ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਲੈਣ ਲਈ ਸੰਗਤਾਂ ਝੋਲੀਆਂ ਅੱਡ ਕੇ ਲੰਮਾ ਸਮਾਂ ਇਸ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਬੈਠੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਹਨ। ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਕਮੇਟੀ ਵੱਲੋਂ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਬੇਰੀ ਨੇੜੇ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਰੱਖਣ ਅਤੇ ਜੂਠੇ ਹੱਥ ਨਾ ਲਗਾਉਣ ਦੀ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ।

ਨਿਤਨੇਮ

ਨਿਤਨੇਮ ਲਈ ਇਹ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਹਿੰਦੀ ਹੈ ਮਾਂ ਦੀ ਗੋਦੀ ‘ਚ।

ਬਹਿੰਦੀ ਹੈ, ਬਹਿੰਦੀ ਸੀ ਤੇ ਬਹਿੰਦੀ ਰਹੇਗੀ। ਹਾਂ ਰਹੇਗੀ, ਜਦ ਇਹ ਮਾਂ ਦੇਹ ਦਾ ਓਲ੍ਹਾ ਕਰ ਗਈ ਤਾਂ ‘ਮਾਤਾ ਧਰਤ’ ਦੀ ਗੋਦ ‘ਚ ਬੈਠ ਕੇ ਨਿਤਨੇਮ ਕਰਿਆ ਕਰੇਗੀ।

ਜਦੋ ਵੀ ਅਸੰਖ ਵਾਲੀ ਅੰਤਿਮ ਪਉੜੀ ਆਉਣੀ,

“ਅਸੰਖ ਗਲਵਢ ਹਤਿਆ ਕਮਾਹਿ ॥ ਅਸੰਖ ਪਾਪੀ ਪਾਪੁ ਕਰਿ ਜਾਹਿ ॥”

ਤਾਂ ਓਹਨੇ ਹੌਲੀ ਦੇਣੇ ਕਹਿਣਾ, “ਇਹ ਮਹਾਰਾਜ ਨੇ ਗੰਗੂ ਲਈ ਲਿਖੀ ਆ….”।

ਤੇ ਫੇਰ ਜਦ ਮਾਂ ਨੇ ਪੜ੍ਹਨਾ, “ਨਾਨਕ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਕੇਤੀ ਛੁਟੀ ਨਾਲਿ ॥” ਤਾਂ ਓਹਨੇ ਕਹਿਣਾ ਇਹ ਸੱਚੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਨੇ ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜਾਦਿਆਂ ਲਈ ਲਿਖੀ ਹੈ।

ਨਿਤਨੇਮ ਵਿਚ ਉਹ ਬਸ ੨-੩ ਥਾਈਂ ਬੋਲਦੀ ਸੀ। ਇਕ ਉਥੇ ਜਿਥੇ ਮਾਂ ਪੜ੍ਹਦੀ,

“ਭੰਡਿ ਜੰਮੀਐ ਭੰਡਿ ਨਿੰਮੀਐ ਭੰਡਿ ਮੰਗਣੁ ਵੀਆਹੁ ॥

ਆਹ ਮੇਰੇ ਲਈ, ਉਸਨੇ ਝੱਟ ਬੋਲਣਾ। “ਸਾਰੀ ਬਾਣੀ ਤੇਰੇ ਲਈ ਆ ਪੁੱਤ”, ਬਾਪੂ ਜੀ ਨੇ ਬੋਲਣਾ, “ਹਾਂ ਪਰ ਆਹ ਮੇਰੇ ਲਈ”, ਤੇ ਇਹ ਕਹਿੰਦਿਆਂ ਓਹਨੇ ਗੋਦ ਵਿਚ ਬੈਠੇ ਹੀ ਮੂੰਹ ਉਤਾਂਹ ਚੁੱਕ ਕੇ ਮਾਂ ਦੇ ਮੂੰਹ ਵੱਲ ਦੇਖਣਾ, ਹਾਮੀਂ ਭਰਵਾਉਣ ਲਈ, “ਹਣਾ ਬੀਜੀ…”, “ਹਾਂ ਪੁੱਤ”, ਮਾਂ ਨੇ ਵੀ ਹਾਂ ਭਰਨੀ।

ਸਾਹਿਬਜਾਦਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਬਾਬਾ ਫਤਹਿ ਸਿੰਘ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਪਿਆਰ ਸੀ। ਉਸ ਨੇ ਕਈ ਵਾਰ ਮਾਂ ਨੂੰ ਕਹਿਣਾ, “ਬੀਜੀ, ਮੇਰਾ ਬੀਰੇ ਫਤਹਿ ਸਿੰਘ ਨਾਲ ਖੇਡਣ ਨੂੰ ਬੜਾ ਦਿਲ ਕਰਦਾ…”, ਤੇ ਇਹ ਸੁਣਦਿਆਂ ਮਾਂ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਅੱਥਰੂ ਆ ਜਾਣੇ ਤੇ ਮੂੰਹੋਂ ਦੋ ਕੌੜੇ ਬੋਲ ਗੰਗੂ ਪ੍ਰਤੀ ਨਿਕਲ ਜਾਣੇ।

“ਬੀਜੀ, ਜੇ ਆਪਾਂ ਸਰਹੰਦ ਦੀ ਦੀਵਾਰ ਢਾਹ ਦੇਈਏ ਤਾਂ ਬਿਚੋਂ ਬੀਰੇ ਨਿਕਲ ਆਉਣਗੇ”?

ਹੁਣ ਏਸ ਸਵਾਲ ਦਾ ਮਾਂ ਕੀ ਜਵਾਬ ਦੇਵੇ, ਕੋਈ ਵੀ ਐਸੇ ਭੋਲੇ ਸਵਾਲ ਦਾ ਕੀ ਜਵਾਬ ਦੇਵੇ।

“ਜੇ ਬੀਰਾ ਫਤਹਿ ਸਿੰਘ ਆ ਜਾਵੇ ਨਾ, ਤਾਂ ਮੈਂ ਓਹਨੂੰ ਗੁੜ ਵਾਲੇ ਮਿੱਠੇ ਚੌਲ ਖਵਾਊਂ…. ਹਣਾ ਬੀਜੀ ਬੀਰੇ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਪਸੰਦ ਆ ਨਾ ਉਹ ਚੌਲ, ਬੜੇ ਚਾਅ ਨਾਲ ਖਾਂਦਾ ਸੀ ਨਾ ਬੀਰਾ ਉਹ…. ਹਣਾ ਬੀਜੀ…. ਤੁਸੀਂ ਬੋਲਦੇ ਕਿਉਂ ਨਈ…”?

“ਹਾਂ ਪੁੱਤ…” ਮਾਂ ਨੇ ਭਰੇ ਗੱਚ ‘ਚੋਂ ਮਸਾਂ ਦੋ ਸ਼ਬਦ ਕੱਢਣੇ।

“ਜੇ ਬੀਰਾ ਆਇਆ ਨਾ ਤਾਂ ਮੈਂ ਬੀ ਓਹਦੇ ਨਾਲ ਜੰਗਲਾਂ ‘ਚ ਜਾਊਂ, ਸਿੰਘ ਇਕੱਠੇ ਕਰੂਂ ਤੇ ਜ਼ਾਲਮਾਂ ਨਾਲ ਟੱਕਰ ਲਊਂ…. ਬਸ ਇਕ ਵਾਰ ਆ ਜਾਵੇ…”, ਉਹ ਲਗਾਤਾਰ ਬੋਲਦੀ ਰਹਿੰਦੀ। ਗੁੱਡੀਆਂ ਪਟੋਲਿਆਂ ਨਾਲ ਤਾਂ ਉਹ ਕਦੇ ਖੇਡੀ ਈ ਨਹੀਂ ਸੀ।

ਪੰਜਾਂ ਤੱਤਾਂ, ਪੰਜਾਂ ਦਰਿਆਵਾਂ, ਪੰਜਾਂ ਪਿਆਰਿਆਂ, ਪੰਜਾਂ ਕਕਾਰਾਂ ਦੀ ਉਸਤਤ ਕਰਦੀ ਕਰਦੀ ਉਹ ਇਹਨਾਂ ਵਿਚ ਸਮਾਅ ਜਾਂਦੀ….

ਸਦੀਆਂ ਤੋਂ ਇਹ ਇੰਝ ਹੀ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਹੈ….

ਤੇ ਅੱਜ ਉਸਦੀ ਧੀ ਉਸਦੀ ਗੋਦ ਵਿਚ ਬੈਠੀ ਪੜ੍ਹ ਰਹੀ ਹੈ,

“ਪਵਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਧਰਤਿ ਮਹਤੁ ॥

ਦਿਵਸੁ ਰਾਤਿ ਦੁਇ ਦਾਈ ਦਾਇਆ ਖੇਲੈ ਸਗਲ ਜਗਤੁ ॥”

ਤੇ ਇਹ ਇੰਝ ਹੀ ਚਲਦਾ ਰਹੇਗਾ….

~ ਜਗਦੀਪ ਸਿੰਘ ਫਰੀਦਕੋਟ

ਫੋਟੋ ~~ ਪਰਮ ਸਿੰਘ ਪੇਂਟਿੰਗ

ਮਾਂਵਾਂ

ਨਾ ਹੀ ਮਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ

ਨਾ ਹੀ ਛਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ

ਹੁਣ ਵਿਹਲ ਕਿੱਥੇ ਲੋਰੀਆਂ

ਸੁਣਾਵੇ ਦਾਦੀ, ਨਾਨੀ

ਹੁਣ ਮੁੱਲ ਦੇ ਪੰਘੂੜੇ

ਨਾ ਹੀ ਬਾਹਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਭਾਵੇਂ ਵਹਿਮ ਹੀ ਸੀ

ਸੁੱਖਾਂ ਸੁੱਖਦੀ ਸੀ ਵੱਡੀ ਬੇਬੇ

ਬਾਹਲੇ ਪੜੇ ਲਿਖਿਆਂ ਚ’

ਨਾ ਦੁਆਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਸ਼ਹਿਣਸਕਤੀ ਰਹੀ ਨਾ

ਹੁਣ ਨਵੀਂ ਪੀੜ੍ਹੀ ਵਿੱਚ

ਡਾਂਗ ਕੰਗਰੋੜ ਉੱਤੇ

ਨਾ ਸਜਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਪਾਲੀ ਪਲ਼ ਪਲ਼ ਬਦਲ ਰਿਹਾ

ਵਾਂਗ ਮੌਸਮਾਂ ਦੇ

ਜਰਾ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਚੱਲ

ਨਾ ਫਿਜ਼ਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ..

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹਰਹੀਆਂ..

ਨਾ ਹੀ ਮਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ

ਨਾ ਹੀ ਛਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ

ਬੜਾ ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ…..

ਓਏ ਪਾਲੀ…

ਪੈ ਗਿਆ ਫਰਕ

ਨਾ ਹਵਾਵਾਂ ਓਹ ਰਹੀਆਂ.. 

ਲਿਖਤ~~ਵੀਰ ਪਾਲੀ ਬਾਈ

❤❤ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ❤❤

ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ…

ਇੱਕ ਅਮੀਰ ਇਨਸਾਨ ਸਵੇਰ ਆਪਣੇ ਬਿਸਤਰੇ ਤੋਂ ਉੱਠਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਕਮਰੇ ਦੀ ਖਿੜਕੀ ਵਿੱਚੋਂ ਬਾਹਰ ਦੇਖਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਗਰੀਬ ਆਦਮੀ ਘਰ ਦੇ ਡਸਟਬਿਨ ਵਿੱਚੋਂ ਕੁਝ ਖਾਣ ਲਈ ਲੱਭ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਅਮੀਰ ਇਨਸਾਨ ਇਹ ਦੇਖ ਕੇ ਆਖਦਾ ਹੈ…” ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ ਕਿ ਮੈਂ ਗਰੀਬ ਨਹੀਂ ਹਾਂ “…

ਉਹ ਗਰੀਬ ਆਦਮੀ ਕੁਝ ਖਾਣਯੋਗ ਵਸਤੂ ਖਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਦੇਖਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਪਾਗਲ ਵਿਆਕਤੀ ਆਪਣੇ ਕੱਪੜੇ ਊਤਾਰ ਕੇ ਸੜਕ ਤੇ ਹੁੜਦੰਗ ਮਚਾ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਗਰੀਬ ਆਦਮੀ ਇਹ ਦੇਖ ਕੇ ਆਖਦਾ ਹੈ…” ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ ਕਿ ਮੈਂ ਪਾਗਲ ਨਹੀਂ ਹਾਂ “….

ਸੜਕ ਤੇ ਹੁੜਦੰਗ ਮਚਾ ਰਿਹਾ ਪਾਗਲ ਵਿਆਕਤੀ ਕੀ ਦੇਖਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਐਬੂੰਲੈਂਸ ਕਿਸੇ ਬਿਮਾਰ ਵਿਆਕਤੀ ਨੂੰ ਹਸਪਤਾਲ ਬੜੀ ਤੇਜੀ ਨਾਲ ਲੈ ਜਾ ਰਹੀ ਆ, ਪਾਗਲ ਵਿਆਕਤੀ ਐਬੂੰਲੈਂਸ ਨੂੰ ਜਾਂਦਿਆ ਦੇਖ ਕੇ ਆਖਦਾ ਹੈ….” ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ ਕਿ ਮੈਂ ਤੰਦਰੁਸਤ ਹਾਂ “…

ਹਸਪਤਾਲ ਦਵਾਈ ਲੈਣ ਜਾ ਰਿਹਾ ਬਿਮਾਰ ਵਿਆਕਤੀ ਅੰਦਰ ਵੜਦੇ ਹੀ ਦੇਖਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇੱਕ ਮਰੀਜ ਜਿਸਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਤੇ ਉਸ ਮ੍ਰਿਤਕ ਵਿਆਕਤੀ ਨੂੰ ਮੋਰਚਰੀ ਵੱਲ ਲਿਜਾਇਆ ਜਾ ਰਿਹਾ, ਉਸ ਡੈਡਬਾਡੀ ਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਬਿਮਾਰ ਵਿਆਕਤੀ ਆਖਦਾ ਹੈ..” ਸ਼ੁਕਰ ਦਾਤਿਆ ਕਿ ਮੈਂ ਜਿੰਦਾ ਹਾਂ “….

ਇੱਕ ਮ੍ਰਿਤਕ ਇਨਸਾਨ ਹੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਸ਼ੁਕਰ ਅਦਾ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ

ਇਹੀ ਸੱਚ ਹੈ

ਸਾਨੂੰ ਹਰ ਪਲ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਸ਼ੁਕਰ ਅਦਾ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਏ

ਐਨੀ ਵਧੀਆ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇਣ ਲਈ।